brajmahima.com | लोक-कथा Series – कथा 01
वृंदावन में हर मंदिर का अपना एक रहस्य है, पर बाँके बिहारी जी के नाम का रहस्य सबसे निराला है। लोग पूछते हैं कि श्रीकृष्ण के हजारों नाम हैं, तो यहाँ उन्हें ‘बाँके बिहारी’ ही क्यों कहा जाता है? इसके पीछे स्वामी हरिदास जी और उनके शिष्यों की एक दिव्य लीला है।
1. नाम का अर्थ क्या है?
‘बाँके’ का अर्थ होता है – टेढ़ा, त्रिभंगी। जो तीन जगह से टेढ़ा खड़ा हो। और ‘बिहारी’ का अर्थ है – विहार करने वाला, लीला करने वाला। यानी जो अपनी टेढ़ी-मेढ़ी अदाओं से वृंदावन की कुंजों में विहार करता है, वो है बाँके बिहारी।
2. कथा की शुरुआत – स्वामी हरिदास जी की साधना
लगभग 500 साल पहले, संगीत सम्राट स्वामी हरिदास जी निधिवन में कठोर तपस्या करते थे। वो बाँसुरी वादन और रागों से अपने आराध्य श्यामा-श्याम को रिझाते थे। उनकी भक्ति इतनी प्रबल थी कि स्वयं युगल सरकार उनके सामने प्रकट हो जाते थे।
3. शिष्यों का आग्रह
स्वामी जी के शिष्यों ने एक दिन कहा – “गुरुदेव, आप तो रोज़ युगल दर्शन करते हैं, हमें भी तो उस दिव्य रूप के दर्शन करा दीजिए।” स्वामी जी बोले कि वो तेज़ आप सहन नहीं कर पाओगे, पर शिष्य नहीं माने।
4. दिव्य प्रकाश से मूर्ति का प्रकट होना
शिष्यों के बार-बार आग्रह पर स्वामी जी निधिवन में अपनी कुटिया में गए और अपनी ललित राग में एक पद गाया। कहते हैं कि गाते-गाते कुटिया में ऐसा तेज प्रकाश फैला कि आँखें चुंधिया गईं। उस प्रकाश में से श्री राधा-कृष्ण की युगल जोड़ी प्रकट हुई।
5. बाँके रूप कैसे बना?
शिष्यों की आँखें उस दिव्य तेज को सहन नहीं कर पा रही थीं। तब स्वामी जी ने प्रार्थना की – “प्रभु, इस तेज को समेट लो।” उनकी प्रार्थना पर श्री राधा जी तो उस प्रकाश में ही समा गईं और श्रीकृष्ण अकेले रह गए, पर उनका रूप बदल गया। वही युगल रूप एक होकर एक ऐसी काले रंग की मनोहर मूर्ति बन गया जो कमर, गर्दन और पैरों से तीन जगह टेढ़ी खड़ी थी। यही त्रिभंगी रूप था।
6. नामकरण – बाँके बिहारी
इस टेढ़े-मेढ़े, बाँके रूप को देखकर स्वामी जी के मुख से निकला – “कुंज बिहारी श्री हरिदास… बाँके बिहारी जी!” तब से इस रूप का नाम बाँके बिहारी पड़ा। यह मूर्ति स्वयं संगीत और भक्ति से प्रकट हुई है, किसी ने घड़ी नहीं है।
7. आज भी निधिवन में है प्रमाण
मान्यता है कि आज भी निधिवन की जिस कुटिया में स्वामी जी साधना करते थे, वहाँ बाँके बिहारी जी प्रकट हुए थे। इसलिए आज भी बाँके बिहारी जी को दिन में कई बार पर्दा करके विश्राम कराया जाता है, क्योंकि वो आज भी निधिवन में रास करने जाते हैं। उनकी टेढ़ी चितवन ही भक्तों को बाँकेपन से घायल कर देती है।
निष्कर्ष:
तो बाँके बिहारी नाम कोई रखा हुआ नाम नहीं है, यह उनके रूप और लीला का वर्णन है। जो बाँका है, जो बाँकी अदा वाला है और जो वृंदावन में विहार करता है, वही हमारा बाँके बिहारी है।
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